Thursday, July 17, 2014

हरेला - त्योहार कुमाँऊ का

हरेला - त्योहार कुमाँऊ का 

हरेला के अवसर पर माता - पिता अपने दिल से अपने बच्चो के लिए प्रार्थना करते है और उनको आशीर्वाद देते है | हरेला हरियाली, खुशीऔर समृद्धि का प्रतीक है. | यह  माना  जाता है की भगवन शिव  और पार्वती का विवाह हरेला  के शुभ दिन ही हुआ था | 

नवविवाहित लड़किया मायके  जाने के लिए उत्सुक रहतीं है | वे अपने भाइयों को हरेला देती हैं और परिवार में माता - पिता और बड़े बुजुर्गों  का आशीर्वाद लेती है |  सामान्य तौर पर  हरेला 16 - 1 7  जुलाई  पर पड़ता है जो नवरात्र के 10 वें दिन पर मनाया जाता  है |  एक वर्ष में  नवरात्री तीन बार आते है   - मार्च / अप्रैल, जुलाई / अगस्त, सितम्बर / अक्टूबर.
मां दुर्गा के भक्त नवरात्रों  के दौरान प्रार्थना और सुखद जीवन के लिए उपवास रखते हैं. दसवें दिन मां दुर्गा की पूजा की जाती है | 

श्रावण कृष्ण दसमी  (जुलाई - अगस्त) में हरेला पुरे कुमाऊं भर में मनाया जाता है. यह  बरसात के मौसम के आगमन के सुवागत के लिए त्योहार के रूप में मनाया जाता है | 

कैसे उगाये हरेला  

श्रावण (जुलाई) के पहले दिन पड़ने वाले इस  दिन सूर्य चंद्रमा के घर में प्रवेश करती है और दिन घटना शुरू होता है | अनाज यानी गेहूं, जौ, भूलभुलैया, घोड़े सेम, सरसों, झँगूरा, भट्ट (सोयाबीन) या गहत आदि पांच या सात प्रकार के बीजों को दस दिन पहले  एक साथ मिलाया जाता है और बर्तन में बोया जाता है |  एक अंधेरे कमरे के अंदर. दो, पांच या सात  छोटी टोकरी या बर्तन मिट्टी से भर कर उसमे हरेला उगा कर घर के अंदर रखा जाता है | 

परिवार का पुजारी या परिवार का बड़ा सदस्य इस टोकरी या बर्तन में बीज और पानी  देवी देवताओं की पूजा के बाद छिड़कता है | सूरज की रोशनी या सूर्य की किरणों उन पर न गिरे इसलिए एक अंधेरे कमरे में रखा जाता है|  यह दो कारणों के लिए किया जाता है -  इस तरह हरेला पीला हो जाता है | हर पौधे की सूर्य के प्रकाश की दिशा में बढ़ने की प्रवृत्ति होती है क्योंकि संयंत्र का विकास तेजी से हो जाता है |  सूर्य के प्रकाश को आकर्षित करने के लिए आदेश में पौधे तेजी से विकसित करने के लिए प्रयास करते है|  यह भी परिवार के साथ उपलब्ध बीज के एक परीक्षण (Test) है. इस प्रकार लोगों को उनके द्वारा बोया बीज की गुणवत्ता के बारे में पता चलता है | बीज को  नियमित रूप से पानी पिलाया जाता है तथा हरेला उगना दस दिन का समय  दिया जाता है. नौवें दिन एक विशेष उपकरण के द्वारा  खुदाई कि जाती  है |  खुदाई के बाद हरेला कलेवा ( पवित्र धागे ) से बाँधा जाता है | 

मान्यताएं 
आसाढ़  के महीने के अंतिम दिन, एक दिन हरेला  के तयोहार से पहले, एक नकली शादी छोटे मिट्टी की मूर्तियों के साथ किया जाता है |  कुछ स्थानों पर  शिव, पार्वती और गणेश की  चित्रित छवियों तैयार की जाती है और शक्रान्ति दिन पूजा की जाती है. देवी देवताओं के इन छोटे मूर्तियों दीकर्स  कहा जाता है.  बैल को  भी हरेला के अवसर पर आराम दिया जाता है. इस प्रकार भगवान शिव और पार्वती की शादी का जश्न मनाया जाता है और लोग \बरसात के मौसम और नई फसल का स्वागत करते है |

कैसे लगाया जाता है हरेला :

10 वें दिन हरेला  कट जाता है  हरेला  लगाने की विधि भी निर्धारित है. सबसे पहले हरेला  पैरों पर रख दिया जाता है. पैर के ऊपरी हिस्से को छूने के बाद, हरेला फिर घुटने छाती और फिर कंधों को छूता है. इन स्थानों पर हरेला  छूने के बाद, कुछ हरेला  कान के पीछे रखा जाता है और अंत में कुछ हरेला सिर पर रखा जाता है |  हरेला दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए भेजा जाता है. मुझे आज भी याद है कैसे यह अंतर्देशी चिठियों के अंदर रख के भेजा जाता था  और दूर दूर तक माता - पिता अपना आशीर्वाद अपने बच्चो तक पहुँचाते थे | 



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Wednesday, July 2, 2014

कलियुग में कहां हैं श्री हनुमान?




श्री हनुमान बल, पराक्रम, ऊर्जा, बुद्धि, सेवा, भक्ति के आदर्श देवता माने जाते हैं। यही कारण है कि शास्त्रों में श्री हनुमान को सकलगुणनिधान भी कहा गया है। श्री हनुमान को चिरंजीव सरल शब्दों में कहें तो अमर माना जाता है। 

हनुमान उपासना के महापाठ श्री हनुमान चालीसा में गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि - 'चारो जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा।'

इस चौपाई से साफ संकेत है कि श्री हनुमान ऐसे देवता है, जो हर युग में किसी न किसी रूप, शक्ति  और गुणों के साथ जगत के लिए संकटमोचक बनकर मौजूद रहे। श्री हनुमान से जुड़ी यही विलक्षण और अद्भुत बात उनके प्रति आस्था और श्रद्धा गहरी करती है। 


इसलिए यहां जानिए, श्री हनुमान किस युग में किस तरह जगत के लिए शोकनाशक बनें और खासतौर पर कलियुग यानी आज के दौर में श्री हनुमान कहां बसते हैं - 

सतयुग - श्री हनुमान रुद्र अवतार माने जाते हैं। शिव का दु:खों को दूर करने वाला रूप ही रुद्र है। इस तरह कहा जा सकता है कि सतयुग में हनुमान का शिव रुप ही जगत के लिए कल्याणकारी और संकटनाशक रहा। 

त्रेतायुग - इस युग में श्री हनुमान को भक्ति, सेवा और समर्पण का आदर्श माना जाता है। शास्त्रों के मुताबिक विष्णु अवतार श्री राम और रुद्र अवतार श्री हनुमान यानी पालन और संहार शक्तियों के मिलन से जगत की बुरी और दुष्ट शक्तियों का अंत हुआ। 

द्वापर युग - इस युग में श्री हनुमान नर और नारायण रूप भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के साथ धर्मयुद्ध में रथ की ध्वजा में उपस्थित रहे। यह प्रतीकात्मक रूप में संकेत है कि श्री हनुमान इस युग में भी धर्म की रक्षा के लिए मौजूद रहे। 


कलियुग - पौराणिक मान्यतओं में कलियुग में श्री हनुमान का निवास गन्धमानदन पर्वत पर है। यही नहीं माना जाता है कि कलियुग में श्री हनुमान जहां-जहां अपने इष्ट श्रीराम का ध्यान और स्मरण होता है, वहां अदृश्य रूप में उपस्थित रहते हैं। शास्त्रों में उनके गुणों की स्तुति में लिखा भी गया है कि - 'यत्र-यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र-तत्र कृत मस्तकांजलिं।' 

इस तरह श्री हनुमान का स्मरण हर युग में अलग-अलग रूप और शक्तियों के साथ संकटमोचक देवता के रूप में जगत को विपत्तियों से उबारते रहे हैं।



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एक दिन तेरी भी डोली निकल जाएगी



दो पल की है तेरी कहानी
हम नहीं कहते कहते है ज्ञानी
एक दिन तेरी डोली भी निकल जाएगी
एक दिन तेरी डोली भी निकल जाएगी
चार कंधो पे  सज धज के  चली  जाएगी
एक दिन तेरी भी डोली  निकल जाएगी

बचपन तो बीत गया हाँ खेल खेल में
आई जवानी तो पड़ा  माया के फेर में
वक़्त ये जायेगा फिर न यह आएगा
जब तक तू सभलेगा  जमाना बीत जायेगा

यह धन दौलत काम न आये
तेरे अपने भी साथ ना जाये
तेरी अच्छाई  ही वहा काम आयेगी
एक दिन तेरी भी डोली  निकल जाएगी
चार कंधो पे  सज धज के  चली  जाएगी

सबका जो मालिक है लेगा हिसाब वो
तुझसे मांगेगा का तेरे कर्मा का जवाब वो
एक तराजू में तुलते वह सारे
हो देर चाहे  न होगी अंधेर  वह पायरे
न सिफारिश का काम चलता है
न किसी का भी नाम चलता है
उसकी लाठी की भी आअवज नहीं आयेगेइ
एक दिन तेरी भी डोली  निकल जाएगी
चार कंधो पे  सज धज के  चली  जाएगी

करते बुरे जो बुरा फल ही पाते है
करते जो भला कर्म बरसो याद आते है
पाप कमाता है पुण्य गवत है
अपने कर्मो की आग में एक दिन जल जाता है
काल आयेगा मार  कहेयेगा अपनी जान से भी तू चला जायेगा
पुण्य की नाव ही बहव से तर  पायेगी
एक दिन तेरी भी डोली  निकल जाएगी
चार कंधो पे  सज धज के  चली  जाएगी


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Saturday, June 28, 2014

मनमोहन तुम मुरली बजाना भूल गए।


मथुरा में जा कर मनमोहन तुम मुरली बजाना भूल गए। ३ 
मुरली का बजाना भूल गए गौओ का चरआना भूल गए 

क्या याद नहीं मोहन तुमको गोकुल में माटी का खाना।   ३ 
सखियो के घर में जाकरके ग्वालो  संग माखन चुराना 

www.naithanadevi.com माखन तो  आज भी है मटकी में तुम गोकुल आना भूल गए 
मथुरा में जा कर मनमोहन तुम मुरली बजाना भूल गए।

क्या याद नहीं मोहन तुमको मैया का लाड लड़ाना  वोः 
नित प्रातः सवेर उठ  करके माखन मिश्री का खिलाना वोः 

मैया आज  भी आस में बैठी है तुम भोग लगाना भूल गए 
मथुरा में जा कर मनमोहन तुम मुरली बजाना भूल गए।

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क्या याद नहीं मोहन तुमको पनघट पर सखियो का आना 
बस एक ही छलक  दिखा कर कर वह कदम के पीछे चिप जाना 

सखिया तो आज भी आती है तुम पनघट आना भूल गए 
मथुरा में जा कर मनमोहन तुम मुरली बजाना भूल गए।

क्या याद नहीं मोहन तुमको राधा संग रास रचाना  वो 
माधवन में भानु दुलारी को बंसी की तान सुनना वो 

वो तोह नयन बिछाये बैठी है तुम मधुवन अाना भूल गये. 
मथुरा में जा कर मनमोहन तुम मुरली बजाना भूल गए।

मथुरा में जा कर मनमोहन तुम मुरली बजाना भूल गए।
मुरली का बजाना भूल गए गौओ का चरआना भूल गए 

ओ श्याम पिया तुम बिन ना लागे जिया 
हे मनमोहन प्रीत पिया झर  झर  रोये अंखिया 
ओ श्याम पिया तुम बिन ना लागे जिया


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मैं तुम्हे कभी तो पाऊँगी

मैं तुम्हे कभी तो पाऊँगी
मेरे जन्मो के साथी सजन  .. 2 
मैं तुम्हे कभी तो पाऊँगी 

पग नुपुर की झंकारों  से 
भाओ भरे मधुर इशारो से 
पग नुपुर की झंकारों  से 

सांसो के पंखो से उड़ कर
सांसो के पंखो से उड़ कर
तारो तक खोज लाऊंगी 
तारो तक खोज लाऊंगी
मैं तुम्हे कभी तो पाऊँगी 
मैं तुम्हे कभी तो पाऊँगी 

मेरे जन्मो के साथी साजन 
मैं तुम्हे कभी तो पाऊँगी 
जोगन का भेस बना के 
इस जग से आँख बचा कर
मैं तुम्हे पाने का प्रयास करुँगी


मन के एक तार पर साजन 
मैं गीत विरहा के गाउंगी 

तुम छिपना राधा के मन में 
मधुवन की रंगीली गुंजन में 
मैं बन कर ललिता की वीणा 
थिरको पर तुम्हे नचाउंगी 
थिरको पर तुम्हे नचाउंगी
मैं तुम्हे कभी तो पाऊँगी 

आशा लागि मिलन की 
 आशा लागि मिलन की 
मेरे जनम जनम के मीत अपने मोहन लाला से 
छन  छन  गए प्रीत 
मैं तेरे ही गीत गाउंगी 
मैं तुम्हे कभी तो पाऊँगी 

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जय श्री खाटू श्याम



कलयुग में एक सहारा है खाटू वाला श्याम हमारा है

चारो
तरफ दरबार की चर्चा है हाथो हाथ ये देता परचा है
दुखड़े अपने इन्हें सुना जाओ और श्याम की शरण में जाओ



हाथ जोड़ विनती करू सुणज्यो चित्त लगाय।
दास आ गयो शरण में रखियो इसकी लाज॥
धन्य ढूंढारो देस हे खाटू नगर सूजान।
अनुपम छवि श्री श्याम की दरशन से कल्याण॥
श्याम श्याम तॊ मैं रटूं श्याम है जीवन प्राण।
श्याम भक्त जग में बडे उनको करूं प्रणाम॥
खाटू नगर के बीच में बण्यो आपको धाम।
फागूण शुक्ला मेला भरे जय जय बाबा श्याम॥
फागूण शुक्ला द्वादशी उत्सव भारी होय।
बाबा के दरबार से खाली जाय न कोय॥
उमापति लक्ष्मीपति सीतापति श्रीराम।
लज्जा सब की राखियो खाटू के बाबा श्याम॥
पान सुपारी इलायची इतर सुगंध भरपूर।
सब भक्तों की विनती दरशन देऒ हुजूऱ॥
आलुसिंहजी तो प्रेम से धरे श्याम का ध्यान।
श्याम भक्त पावे सदा श्री श्याम कृपा से मान॥

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Wednesday, June 25, 2014

रघुबीर दास प्रभु ज़ी - जुहू मुंबई - सत्संग महोत्सव

 कोई  कहे गोविंद कोई गोपाला     कोई  कहे गोविंद कोई गोपाला
 मैं तो कहु सावरिया बासुरी वाला  मैं तो कहु सावरिया बासुरी वाला